*मनकबत दर ए शाने हुजूर रफी मियां रह0
सरजमीन ए जमुका शाहजहांपुर*
मरहबा मरहबा मेरे लब पर आज नगमा है रफी मियां का
क्यों न खुशियां मनाएं दीवाने उर्स आया है रफी मियां का
लाई हमको कहां आज किस्मत जिनका दरबार है फैज रहमत
देखिए फैज ए रहमत के अंदर आस्ताना है रफी मियां का
हाथ में उनके छड़ी है लब पे हूं हूं कि सदा हर घड़ी है
जिक्र ए मौला में है जो दीवाना मस्ताना है रफी मियां का
चना दाल रोटी का लंगर यूं ही चलता ही रहता है हर दम
भूख के साथ रूह को सींचे वो खजाना है रफी मियां का
दर्द ए दिल की दवा इनके सदके ज़ख्मे ग़म की दवा इनके सदके
हर एक ग़म की दवा हर मर्ज का दर्माना है रफी मियां का
शेर कहता है जमाने से आओ आके अपनी जबीने अकीदत झुकाओ
बिगड़ी तकदीर को जो संवारे वो नजराना है रफी मियां का



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