मनक़बत-ए-साबिर पाक रहमतुल्लाह अलैह
सुकूं तुमको न जब आये दर-ए-साबिर पे आ जाना।
अगर दिल गम से घबराये दर-ए-साबिर पे आ जाना।
ये चौखट चूम लेना सर पे रखवा लेना चादर को
कोई जब दर्द तड़पाये दर-ए-साबिर पे आ जाना।
ये बो दर है जहां पर दूर होती हैं वलायें सब
नजर जब तुमको लग जाये दर-ए-साबिर पे आ जाना।
यहाँ फ़ैज़-ए-इलाही है, यहाँ नूर-ए-मदीना है,
कोई मुश्किल अगर आए, दर-ए-साबिर पे आ जाना।
कलियर की पाक गलियों में, करम की धूप बिखरी है,
नसीबा जब भी शरमाए, दर-ए-साबिर पे आ जाना।
जो झुककर माँगता रब से, वही झोली को भर लाता,
उम्मीदें जब भी थक जाएँ, दर-ए-साबिर पे आ जाना।
कोई जिन्नात क्या आए, परेशाँ कर नहीं सकते,
करम साबिर जहाँ छाए, दर-ए-साबिर पे आ जाना।
यहाँ हर साँस में रहमत, यहाँ हर दिल को राहत है,
करम की आस जग जाए, दर-ए-साबिर पे आ जाना।
जो सच्चे दिल से आता है, कभी महरूम नहीं जाता,
मुरादें जब भी रुक जाएँ, दर-ए-साबिर पे आ जाना।
करम की एक नज़र भर से, बदल जाए मुक़द्दर भी,
अँधेरा जब तुझे डराए, दर-ए-साबिर पे आ जाना।
सलाम उन पर हमेशा हो, करम जिनकी विरासत है,
ज़माना जब भी ठुकराए, दर-ए-साबिर पे आ जाना।
बस इतनी इल्तिज़ा है, शेर की रहे दिल में अदब उनका,
बुलावा जब भी फिर आए, दर-ए-साबिर पे आ जाना।



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